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महाभारत • पर्व 1

आदि पर्व

आरम्भ की महान कथा

आदि पर्व महाभारत की आधारभूमि तैयार करता है। इसमें महाकाव्य की परंपरा, प्राचीन वंशावलियाँ, कुरु राजकुमारों का जन्म और बाल्यकाल, पाण्डवों का उदय, द्रौपदी-विवाह, अर्जुन का वनवास और खाण्डव वन दहन तक की प्रमुख घटनाएँ आती हैं।

इस पर्व के विभाग

आदि पर्व के प्रमुख कथा-विभाग क्रम से पढ़ें।

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आदि पर्व

अनुक्रमणिका – महाभारत कथा का आरम्भ

Anukramanika – The Epic Begins

नैमिषारण्य के पवित्र वन में शौनक महर्षि बारह वर्षों का यज्ञ कर रहे थे और अनेक ऋषि वहाँ एकत्र होकर धर्मचर्चा में लगे रहते थे। उसी समय पुराणों, इतिहासों और वंशकथाओं के महान ज्ञाता लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सौति वहाँ पहुँचे। ऋषियों ने अतिथि के रूप में उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और पूछा कि वे कहाँ से आए हैं तथा कौन-कौन सी महान कथाएँ सुनकर आए हैं।

सौति ने बताया कि वे राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में उपस्थित थे, जहाँ वैशम्पायन महर्षि ने भगवान व्यास की आज्ञा से महाभारत की कथा सुनाई थी। इसके बाद वे समन्तपञ्चक जैसे अनेक पवित्र स्थलों का दर्शन करते हुए नैमिषारण्य पहुँचे। यह सुनकर ऋषियों ने उनसे वही महाभारत उन्हें भी सुनाने का अनुरोध किया।

कथा आरम्भ करने से पहले सौति नारायण, नर और देवी सरस्वती को प्रणाम करके ‘जय’ नामक महान आख्यान का स्मरण करने की परंपरा बताते हैं। वे समझाते हैं कि व्यास ने इस महाकाव्य को केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं बनाया, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को समेटने वाले ज्ञानसागर के रूप में रचा।

प्रसिद्ध परंपरा के अनुसार जब व्यास ने महाभारत को लिखित रूप देने का संकल्प किया, तब उन्होंने ब्रह्मा का ध्यान किया। ब्रह्मा ने उन्हें गणपति को लेखक बनाने की सलाह दी। गणपति ने शर्त रखी कि व्यास बिना रुके बोलेंगे; व्यास ने प्रत्युत्तर में कहा कि गणपति प्रत्येक श्लोक का अर्थ पूरी तरह समझकर ही लिखेंगे। कहा जाता है कि इसी कारण व्यास गहन अर्थ वाले श्लोक रचते हुए कथा को आगे बढ़ा सके।

आरम्भ से ही महाभारत का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। यह दिखाने वाला है कि एक निर्णय दूसरे निर्णय का कारण कैसे बनता है, एक प्रतिज्ञा पीढ़ियों का भविष्य कैसे बदल सकती है और व्यक्तिगत क्रोध राजाओं तथा राज्यों के विनाश तक कैसे पहुँच सकता है। इसी विशालता को उस परंपरागत कथन में व्यक्त किया जाता है कि जो यहाँ है वह कहीं और भी मिल सकता है, और जो यहाँ नहीं है वह अन्यत्र मिलना कठिन है।

इस प्रकार नैमिषारण्य के ऋषियों के सामने सौति महाभारत की महान कथा का द्वार खोलते हैं। श्रोता केवल वीरगाथाएँ सुनने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए तैयार होते हैं कि धर्मसंकट में मनुष्य कैसे सोचे, शक्ति मिलने पर कैसे आचरण करे और परिवार के संबंध कब शक्ति तथा कब दुर्बलता बनते हैं। यही अनुक्रमणिका का प्रमुख उद्देश्य है।

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आदि पर्व

संग्रह – महाभारत की विशाल रूपरेखा

Sangraha – The Vast Scope of the Mahabharatam

संग्रह विभाग पाठक के सामने पहले ही महाभारत की समग्र रूपरेखा रख देता है। इसमें भरत वंश का विस्तार, कुरु वंश में धृतराष्ट्र और पाण्डु की शाखाओं का निर्माण तथा पाण्डव-कौरवों की बाल्यकालीन प्रतिस्पर्धा किस प्रकार अंततः महायुद्ध में बदलती है—इन मुख्य दिशाओं का परिचय मिलता है।

आगे आने वाले वनवास, अज्ञातवास, राज्यभाग के विवाद, दूतकर्म और शांति-प्रयास तथा कुरुक्षेत्र युद्ध जैसे महान प्रसंगों की झलक यहीं मिलती है। पाण्डवों का पराक्रम, दुर्योधन की ईर्ष्या, शकुनि की चालें, कर्ण की निष्ठा, भीष्म की प्रतिज्ञा, द्रोण का ऋणबोध और कृष्ण का धर्मरक्षण—ये सभी आगे की घटनाओं को आकार देने वाली शक्तियों के रूप में सामने आते हैं।

संग्रह युद्ध की विशालता, राजवंशों के विस्तार, भूभागों और योद्धा-समूहों की ओर भी संकेत करता है। महाभारत भले एक परिवार की कथा के रूप में आरम्भ हो, पर उसी परिवार के मतभेद धीरे-धीरे अनेक राज्यों, गुरुओं, मित्रों और योद्धाओं को अपने पक्षों में खींचकर सम्पूर्ण भारतवर्ष को प्रभावित करने लगते हैं।

इस भाग का एक मुख्य संदेश है कि महाविनाश एक दिन में पैदा नहीं होता। छोटी ईर्ष्या को समय पर न रोका जाए तो वह घृणा बन जाती है; अन्याय को पहली बार सह लिया जाए तो वह परंपरा बन सकता है; और शांति के प्रयासों को अहंकार से ठुकराया जाए तो युद्ध अनिवार्य हो सकता है। महाभारत इस सत्य को बार-बार पात्रों के जीवन से दिखाता है।

इसके साथ ही कठिन परिस्थितियों में धर्म पर टिके युधिष्ठिर, मित्रता निभाने वाले कृष्ण, अपार बल के बावजूद परिवार के लिए समर्पित भीम, साधना से श्रेष्ठ बने अर्जुन और अनेक त्यागमयी पात्र कथा में आशा बनाए रखते हैं। इसलिए महाभारत केवल पतन की कथा नहीं है; यह भूलों और संकटों के बीच धर्म को फिर से खोजने की कथा भी है।

संग्रह के अंत तक पाठक को एक विराट यात्रा सामने दिखाई देने लगती है। इस यात्रा में वंशावलियाँ, प्रेमकथाएँ, शाप, वरदान, राजनीति, युद्ध, तपस्या और उपदेश परस्पर जुड़े रहेंगे। महाकाव्य की व्यापक दिशा सामने आ चुकी है; अब उसके मूल प्रसंग एक-एक करके खुलने लगते हैं।

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आदि पर्व

पौष्य – गुरु-शिष्य धर्म और सर्पयज्ञ की भूमिका

Paushya – Teachers, Disciples and the Serpent Sacrifice

पौष्य विभाग में गुरु-शिष्य संबंध से जुड़ी कथाएँ प्रमुख हैं। आयोदधौम्य महर्षि के अरुणि, उपमन्यु और वेद नामक शिष्य थे। गुरु की आज्ञा को कठिनाई के बावजूद पूरा करने की निष्ठा, गुरु पर विश्वास और परिश्रम से ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग इन कथाओं में दिखाई देता है।

अरुणि को खेत से पानी बाहर जाने से रोकने भेजा गया। कई प्रयासों के बाद भी बाँध टिक नहीं पाया तो उसने अपना शरीर ही नाली में रखकर जलप्रवाह रोक दिया। गुरु ने उसकी निष्ठा देखकर प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया। अरुणि गुरुसेवा को केवल आदेश नहीं बल्कि जिम्मेदारी मानने वाले शिष्य का आदर्श बनता है।

उपमन्यु की कथा और कठिन परीक्षाएँ दिखाती है। भोजन के विषय में गुरु के नियमों का पालन करते हुए उसने तीव्र भूख सही। एक समय हानिकारक पत्तियाँ खाने से उसकी दृष्टि चली गई और वह कुएँ में गिर पड़ा, फिर भी गुरु-भक्ति नहीं छोड़ी। कथा के अनुसार अश्विनीकुमारों की कृपा से उसे स्वास्थ्य और दृष्टि वापस मिली।

वेद भी गुरुसेवा में स्थिर रहा और बाद में स्वयं गुरु बना। उसका शिष्य उत्तंक गुरु-दक्षिणा के रूप में गुरुपत्नी के लिए आवश्यक कुण्डल लाने निकला। वह राजा पौष्य के दरबार पहुँचा और रानी के कुण्डल प्राप्त किए, पर तक्षक की दृष्टि पड़ने से उसका मार्ग संकटपूर्ण हो गया।

तक्षक ने कुण्डल चुरा लिए तो उत्तंक नागलोक तक उनका पीछा करता रहा और अंततः उन्हें वापस लेकर गुरु-दक्षिणा पूरी की। किंतु तक्षक के प्रति उसका क्रोध बना रहा। बाद में उसने जनमेजय को याद दिलाया कि तक्षक ने उनके पिता परीक्षित का वध किया था; इस प्रकार उत्तंक का आक्रोश सर्पयज्ञ के लिए प्रेरक कारणों में से एक बना।

यह भाग दिखाता है कि छोटी व्यक्तिगत घटनाएँ विशाल ऐतिहासिक परिणामों से कैसे जुड़ सकती हैं। गुरुसेवा से आरम्भ हुई कथा अंततः जनमेजय के सर्पयज्ञ की भूमिका बनाती है। पौष्य पाठक के सामने कर्तव्य, क्रोध और प्रतिशोध के अंतर को समझने की आवश्यकता रखता है।

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आदि पर्व

पौलोम – भृगु वंश की कथाएँ

Pauloma – The Lineage of Bhrigu

पौलोम विभाग भृगु महर्षि के वंश से जुड़ी कथाओं का विस्तार करता है। शौनक जब अपनी वंशपरंपरा के विषय में पूछते हैं, तब सौति भृगु, पुलोमा, च्यवन, प्रमति, रुरु और प्रमद्वरा की कथाएँ सुनाते हैं। प्रेम, शाप, क्रोध, क्षमा और पुनर्जीवन जैसे भाव इन परस्पर जुड़ी कथाओं में अनेक रूपों में दिखाई देते हैं।

एक राक्षस पुलोमा को, जो भृगु की पत्नी थीं, पहले से स्वयं के लिए निश्चित स्त्री मानकर उनका अपहरण करने आया। अग्नि को साक्षी बनाकर सत्य जानने के बाद वह पुलोमा को ले गया, पर उनके गर्भ का बालक अद्भुत तेज के साथ बाहर आया। वही बालक च्यवन था और उसका तेज राक्षस सह नहीं सका, इसलिए वह नष्ट हो गया।

अग्नि ने सत्य कहा, फिर भी क्रोधित भृगु ने उन्हें ‘सर्वभक्षी’ होने का शाप दिया। दुःखी होकर अग्नि यज्ञकर्म से दूर हो गए तो देवताओं और धार्मिक कर्मों में संकट उत्पन्न हुआ। बाद में ब्रह्मा ने ऐसा समाधान दिया जिससे शाप का प्रभाव भी रहा और अग्नि की पवित्रता भी बनी रही। इससे पता चलता है कि सत्य, परिस्थिति, परिणाम और क्रोध का संबंध कितना जटिल हो सकता है।

च्यवन के वंश में रुरु का जन्म हुआ। उसने अनुपम सुन्दरी प्रमद्वरा से प्रेम किया। विवाह से पहले सर्पदंश के कारण उसकी मृत्यु हो गई। रुरु अपने जीवन का आधा भाग उसे देने को तैयार हो गया। दैवी अनुग्रह से प्रमद्वरा जीवित हुई और दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ।

लेकिन प्रिय को सर्प के कारण खो देने की पीड़ा ने रुरु के भीतर पूरे सर्पकुल के प्रति घोर द्वेष उत्पन्न कर दिया। उसने हर दिखाई देने वाले सर्प को मारने का संकल्प लिया। एक बार वह दुण्डुभ नामक अहानिकर सर्प को मारने वाला था, तब पता चला कि वह वास्तव में शापग्रस्त ऋषि है। उस ऋषि ने रुरु को हिंसा और प्रतिशोध के विषय में समझाया।

इससे रुरु ने समझा कि क्रोध की भी सीमा होनी चाहिए। पौलोम के अंत में यह वंशकथा आस्तीक और सर्पयज्ञ की पृष्ठभूमि से फिर जुड़ती है। व्यक्तिगत पीड़ा को पूरे समुदाय के विरुद्ध प्रतिशोध में बदल देना उचित नहीं—यह संदेश इस भाग में विशेष रूप से उभरता है।

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आदि पर्व

आस्तीक – जनमेजय का सर्पयज्ञ

Astika – Janamejaya's Serpent Sacrifice

आस्तीक विभाग आदि पर्व की सबसे विस्तृत कथा-श्रृंखलाओं में से एक है। कद्रू–विनता की प्रतिस्पर्धा, गरुड़ का जन्म, नागवंश, अमृत की प्राप्ति, शेष–वासुकि की कथाएँ, परीक्षित की मृत्यु और जनमेजय का सर्पयज्ञ—ये सब अंततः आस्तीक महर्षि के माध्यम से एक ही कथा-प्रवाह में जुड़ते हैं।

दक्षप्रजापति की पुत्रियाँ कद्रू और विनता ने कश्यप महर्षि से विवाह किया। वर माँगने पर कद्रू ने एक हजार नागपुत्र माँगे और विनता ने दो अत्यंत शक्तिशाली पुत्र। समय आने पर कद्रू के नाग जन्मे। विनता ने अधीर होकर एक अंडा समय से पहले तोड़ दिया, जिससे अरुण अपूर्ण रूप में जन्मे; बाद में जन्मे गरुड़ अपार शक्तिशाली बने।

उच्चैःश्रवा घोड़े की पूँछ के रंग पर कद्रू और विनता ने शर्त लगाई। अपनी बात को सत्य सिद्ध करने के लिए कद्रू ने नागपुत्रों से छल करने को कहा। जिन्होंने आज्ञा नहीं मानी उन्हें उसने भविष्य में जनमेजय के सर्पयज्ञ में नष्ट होने का शाप दिया। यही शाप आगे आने वाले महान संकट के मूल कारणों में से एक बना।

विनता को दासत्व से मुक्त कराने के लिए गरुड़ नागों द्वारा माँगा गया अमृत लाने निकले। अनेक बाधाओं को पार कर, देवताओं से युद्ध करके उन्होंने अमृतकलश प्राप्त किया। विष्णु ने गरुड़ की शक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपना वाहन बनाया और इन्द्र के साथ भी समझौता हुआ। घटनाएँ ऐसी हुईं कि विनता मुक्त हो गईं, पर नागों को वास्तव में अमरत्व प्राप्त नहीं हुआ।

शेष ने अपने भाइयों के दुराचार से विरक्त होकर तपस्या की। उनकी स्थिरता से प्रसन्न ब्रह्मा ने उन्हें पृथ्वी धारण करने का दायित्व दिया। वासुकि कद्रू के शाप से नागवंश को बचाने का उपाय खोज रहा था। उसे विश्वास था कि जरत्कारु ऋषि और उसकी बहन जरत्कारु से जन्म लेने वाला पुत्र भविष्य में सर्पयज्ञ रोक देगा।

उन दोनों से आस्तीक का जन्म हुआ। कम आयु में ही वह वेदविद्या, धर्मज्ञान और वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध हो गया। दूसरी ओर शृंगी के शाप के कारण राजा परीक्षित तक्षक के दंश से मारे गए। उनके पुत्र जनमेजय ने प्रतिशोध में सर्पयज्ञ आरम्भ किया और मंत्रबल से असंख्य नाग अग्नि में गिरने लगे।

जब तक्षक तक अग्नि की ओर खिंचने लगा, उसी निर्णायक समय आस्तीक यज्ञशाला पहुँचा। उसके ज्ञान, विनय और वाणी से जनमेजय अत्यंत प्रभावित हुए। राजा ने वर माँगने को कहा तो आस्तीक ने सर्पयज्ञ रोक देने का वर माँगा। अपने वचन से बँधे जनमेजय ने यज्ञ बंद कर दिया और नागवंश पूर्ण विनाश से बच गया।

आस्तीक की कथा प्रतिशोध की सीमा पर महाभारत की पहली महान शिक्षाओं में से एक है। पिता की मृत्यु पर जनमेजय का दुःख स्वाभाविक था, पर एक व्यक्ति के अपराध के लिए पूरे समुदाय को नष्ट करना धर्म नहीं। आस्तीक दिखाता है कि क्रोध को रोक देने वाला विवेक भी एक प्रकार का शौर्य है।

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आदि पर्व

आदिवंशावतरण – दिव्य शक्तियों का अवतरण

Adivansavatarana – Divine Powers Enter the World

आदिवंशावतरण विभाग पृथ्वी पर बढ़ते अधर्म के भार और उसे कम करने के लिए देवांशों के मानव वंशों में जन्म लेने की आवश्यकता का वर्णन करता है। महाभारत के प्रमुख वीरों को इसलिए केवल राजवंशों में जन्मे मनुष्य नहीं, बल्कि दैवी शक्तियों से जुड़े व्यक्तित्वों के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है।

परंपरा के अनुसार पृथ्वी देवी दुष्ट राजाओं के भार को सह न सकीं और देवताओं की शरण में गईं। ब्रह्मा के मार्गदर्शन में देवताओं ने अपने-अपने अंश पृथ्वी पर अवतरित करने का निश्चय किया। यही पृष्ठभूमि आगे पाण्डवों, कौरवों, कृष्ण और अनेक महावीरों के जन्म को एक व्यापक ब्रह्माण्डीय अर्थ देती है।

फिर भी महाभारत दैवी जन्म को मानव जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं बनाता। पात्रों की प्रतिज्ञाएँ, भूलें, त्याग और विश्वासघात उन्हीं की जिम्मेदारी के रूप में दिखाए जाते हैं। दैवी पृष्ठभूमि कथा को व्यापक बनाती है, पर धर्म का निर्णय उनके वास्तविक कर्मों पर ही टिका रहता है।

वंशावलियों के माध्यम से यह भाग अनेक राजाओं, ऋषियों और देवांशों के परस्पर संबंध दिखाता है। भरत, यादव, पाञ्चाल और अन्य वंशों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि आगे चलकर वे एक ही महायुद्ध के व्यापक ताने-बाने में मिलते दिखाई देते हैं।

यह पृष्ठभूमि बताती है कि कुरुक्षेत्र युद्ध केवल दो परिवारों का संपत्ति-विवाद नहीं है। समय के साथ जमा हुआ अधर्म, अहंकार, कर्तव्य में विफलता और दैवी उद्देश्य की सिद्धि—ये सभी उस संघर्ष में मिलते हैं। इसलिए आगे की कथा व्यक्तिगत स्तर से लोकधर्म के स्तर तक फैलती है।

आदिवंशावतरण के बाद कथा सीधे कुरु वंश के जन्मों की ओर बढ़ती है। अब तक तैयार दैवी और वंशगत पृष्ठभूमि शंतनु, भीष्म, सत्यवती, धृतराष्ट्र, पाण्डु, विदुर, पाण्डव और कौरवों के जीवन में मूर्त रूप ग्रहण करती है।

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आदि पर्व

सम्भव – कुरु राजकुमारों का जन्म

Sambhava – Birth of the Kuru Princes

सम्भव विभाग आदि पर्व की सबसे निर्णायक वंशकथाओं का विस्तार करता है। राजा शांतनु का गंगा से विवाह, देवव्रत का जन्म और बाद में देवव्रत द्वारा वह भयंकर प्रतिज्ञा लेना जिसके कारण वे ‘भीष्म’ कहलाए—ये सभी कुरु वंश के भविष्य को निर्धारित करने वाले प्रारम्भिक महान मोड़ हैं।

जब शांतनु ने बाद में सत्यवती से विवाह करना चाहा, तो उनके पिता ने शर्त रखी कि सत्यवती से उत्पन्न संतान ही सिंहासन की उत्तराधिकारी होगी। पिता के सुख के लिए देवव्रत ने केवल राजसिंहासन का अधिकार ही नहीं छोड़ा, बल्कि आजीवन ब्रह्मचर्य भी स्वीकार किया। उसी भीषण प्रतिज्ञा से उन्हें भीष्म नाम मिला। उनका त्याग महान था, पर यही प्रतिज्ञा आगे वंश में उत्तराधिकार की कठिनाइयों का कारण बनी।

सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य का जन्म हुआ। जब उत्तराधिकार का संकट आया, तब व्यास के माध्यम से धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र अंधे थे, इसलिए पाण्डु ने राज्य संभाला। बाद में पाण्डु को मिले शाप के कारण वे सामान्य रीति से संतान उत्पन्न नहीं कर सकते थे।

कुन्ती को दुर्वासा महर्षि से ऐसा मंत्र मिला था जिससे वे देवताओं का आह्वान कर संतान प्राप्त कर सकती थीं। धर्मदेव से युधिष्ठिर, वायु से भीम और इन्द्र से अर्जुन जन्मे। माद्री को अश्विनीकुमारों के अनुग्रह से नकुल और सहदेव प्राप्त हुए। दूसरी ओर गांधारी से धृतराष्ट्र के सौ पुत्र, जिनमें दुर्योधन प्रमुख था, तथा पुत्री दुःशला जन्मी।

पाण्डु की मृत्यु के बाद कुन्ती पाँचों पाण्डवों को लेकर हस्तिनापुर आईं। पाण्डव और कौरव साथ बड़े हुए, पर बाल्यकाल से ही प्रतिस्पर्धा बढ़ती गई। भीम की शक्ति से भयभीत दुर्योधन ने उसे विष देकर गंगा में फेंकने का प्रसिद्ध प्रयास किया। भीम जीवित बचा, नागलोक के अनुभव से और अधिक शक्तिशाली होकर लौटा।

कृपाचार्य और बाद में द्रोणाचार्य ने राजकुमारों को शस्त्रविद्या सिखाई। अर्जुन की एकाग्रता और साधना ने द्रोण का विशेष स्नेह पाया। एकलव्य की कथा गुरु-भक्ति, सामाजिक व्यवस्था और प्रतिभा पर गंभीर प्रश्न उठाती है। शस्त्र प्रदर्शन में कर्ण का आगमन और अर्जुन को चुनौती देना कथा में नया तनाव लाता है। दुर्योधन ने तुरंत कर्ण को अंग का राजा बनाकर जीवनभर की मित्रता स्थापित की।

द्रोण की गुरु-दक्षिणा के रूप में द्रुपद को पराजित करने के बाद पाण्डवों की ख्याति और बढ़ी। जनता में युधिष्ठिर की लोकप्रियता बढ़ने से दुर्योधन की ईर्ष्या तीव्र हो गई। परिवार की प्रतियोगिता अब प्राणघातक षड्यंत्र की दिशा में बढ़ने लगी। यही अगली लाक्षागृह कथा की भूमिका बनती है।

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आदि पर्व

जतुगृह – लाक्षागृह की साजिश

Jatugriha – The House of Lac

युधिष्ठिर की बढ़ती लोकप्रियता और पाण्डवों की युद्ध-कुशलता ने दुर्योधन को अत्यंत चिंतित कर दिया। शकुनि, कर्ण, दुःशासन और अन्य निकट सहयोगियों के साथ उसने ऐसा षड्यंत्र सोचा जिसमें खुले युद्ध के बिना पाण्डवों को समाप्त किया जा सके। धृतराष्ट्र को मनाकर पाण्डवों को वारणावत के उत्सव में भेजने की व्यवस्था की गई।

पुरोचन नामक विश्वस्त व्यक्ति को लाख, घी, तेल और राल जैसे अत्यंत ज्वलनशील पदार्थों से एक भव्य भवन बनाने का आदेश दिया गया। बाहर से वह राजमहल जैसा दिखता था, पर भीतर से आग का जाल था। सही समय पर उसे जला कर कुन्ती और पाण्डवों को मार देना ही योजना थी।

विदुर ने खतरे को पहले ही समझ लिया। खुले रूप से चेतावनी देना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने संकेतों में युधिष्ठिर से कहा कि जो आग आने से पहले बाहर निकलने का मार्ग जानता है वही बच सकता है। युधिष्ठिर ने इस गुप्त संकेत का अर्थ समझ लिया।

विदुर द्वारा भेजे गए एक कुशल व्यक्ति ने चुपचाप भूमिगत सुरंग खोदी। पाण्डव पुरोचन पर विश्वास करने का अभिनय करते रहे ताकि किसी को संदेह न हो और सही समय की प्रतीक्षा की। एक रात भवन में आग लगने पर वे सुरंग से निकल गए। राख में अन्य शव मिलने के कारण लोगों ने मान लिया कि कुन्ती और पाण्डव मर गए हैं।

हस्तिनापुर में जनता शोक में डूब गई और षड्यंत्रकारियों ने समझा कि योजना सफल हो गई। पर विदुर संकेतों से जान गए कि पाण्डव जीवित हैं और उन्होंने यह रहस्य रखा। कुछ समय तक उनकी ‘मृत्यु’ की खबर ही उन्हें सुरक्षित रूप से गुप्त जीवन जीने का अवसर देती रही।

इस प्रसंग में विदुर की दूरदृष्टि विशेष रूप से दिखाई देती है। जब प्रत्यक्ष शक्ति उपलब्ध न हो, तब भी बुद्धि, सही समय और गोपनीय संचार से प्राण बचाए जा सकते हैं। दूसरी ओर दुर्योधन की ईर्ष्या अब सामान्य प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर हत्या के प्रयास में बदल चुकी थी।

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आदि पर्व

हिडिम्ब-वध – भीम और हिडिम्बी

Hidimba-vadha – Bhima and Hidimbi

लाक्षागृह से बचने के बाद पाण्डव कुन्ती के साथ वन में यात्रा करते रहे। थककर जब वे एक स्थान पर विश्राम कर रहे थे, उस क्षेत्र में हिडिम्ब नामक राक्षस रहता था। मनुष्यों की गंध पाकर उसने अपनी बहन हिडिम्बी को उन्हें भोजन के रूप में लाने भेजा।

हिडिम्बी पाण्डवों के पास पहुँची और भीम को देखकर उसके बल, रूप और साहस से प्रभावित हुई। उसने भाई की आज्ञा न मानकर भीम को खतरे की सूचना दी और तुरंत वहाँ से निकल जाने को कहा। किंतु भीम ने कहा कि वह अपनी सोती हुई माता और भाइयों को छोड़कर नहीं जाएगा।

देरी देखकर हिडिम्ब स्वयं वहाँ आया। अपनी बहन को पाण्डवों की सहायता करते देखकर वह क्रोधित होकर भीम पर टूट पड़ा। दोनों में भयंकर मल्लयुद्ध हुआ। भीम युद्ध को सोते हुए परिवार से दूर ले गया और अंततः राक्षस का वध कर दिया।

इसके बाद हिडिम्बी ने कुन्ती से भीम से विवाह की अनुमति माँगी। कुन्ती और युधिष्ठिर की सहमति से निश्चित नियमों के अंतर्गत भीम कुछ समय उसके साथ रहा। उनसे घटोत्कच का जन्म हुआ, जो शीघ्र ही अत्यंत बलवान बना और आवश्यकता पड़ने पर पाण्डवों की सहायता के लिए आने का वचन दिया।

घटोत्कच का जन्म आगे के युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। आदि पर्व का यह छोटा-सा वन प्रसंग कुरुक्षेत्र में उस स्थिति तक प्रभाव डालता है जहाँ कर्ण को अपना दिव्य अस्त्र प्रयोग करना पड़ता है। यह दिखाता है कि महाभारत की छोटी मुलाकातें भी भविष्य में महान परिणाम दे सकती हैं।

हिडिम्ब-वध में भीम का शारीरिक बल ही नहीं, परिवार की रक्षा करने का भाव भी दिखाई देता है। हिडिम्बी का चुनाव यह भी सिखाता है कि मनुष्य का मूल्य जन्म से अधिक आचरण से तय होता है—राक्षस कुल में जन्म लेकर भी उसने करुणा चुनी, जबकि हिडिम्ब ने हिंसा।

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आदि पर्व

बक-वध – भीम ने एकचक्र को बचाया

Baka-vadha – Bhima Saves Ekachakra

एकचक्र में अपनी पहचान छिपाकर रहते हुए पाण्डव एक ब्राह्मण परिवार के घर ठहरे। वे भिक्षा लाकर जीवन चलाते और कुन्ती उस भोजन को बाँटती थीं; भीम को उसकी बड़ी देह और शक्ति के कारण अधिक भाग मिलता था। बाहर से जीवन सामान्य दिखता था, पर नगर पर बकासुर का भयानक आतंक छाया था।

बकासुर पास ही रहता था और नगरवासियों से नियमित रूप से बहुत सारा भोजन माँगता था, साथ ही भोजन पहुँचाने वाले मनुष्य को भी बलि के रूप में खा जाता था। प्रत्येक परिवार को अपनी बारी पर किसी एक सदस्य को भेजना पड़ता था। जब पाण्डवों को आश्रय देने वाले परिवार की बारी आई, घर में विलाप मच गया।

कुन्ती ने उनकी पीड़ा जानकर कहा कि वह अपने पुत्र भीम को भेजेगी। ब्राह्मण ने पहले इसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि अतिथि को अपने स्थान पर मृत्यु के लिए भेजना उसे पाप लगा। किंतु कुन्ती ने भीम की शक्ति पर भरोसा दिलाया और कहा कि उसे कोई वास्तविक खतरा नहीं होगा; साथ ही बात गुप्त रखने को कहा।

भीम बकासुर के लिए भेजा जाने वाला भोजन लेकर गया। वहाँ पहुँचकर उसने राक्षस की प्रतीक्षा करने के बजाय स्वयं भोजन करना शुरू कर दिया। क्रोधित बकासुर ने उस पर हमला किया, पर भीम ने लगभग निश्चिंत भाव से भोजन पूरा किया और फिर युद्ध में उतरा।

भयंकर संघर्ष के बाद भीम ने बकासुर का वध कर उसका शरीर नगर के द्वार पर डाल दिया। अगले दिन लोगों ने यह दृश्य देखकर आश्चर्य और राहत महसूस की; वर्षों पुराना भय समाप्त हो गया। किंतु पाण्डवों की पहचान प्रकट न हो, इसलिए वास्तविक वीर का नाम गुप्त रखा गया।

बक-वध में भीम की शक्ति जनरक्षा के काम आती है। आश्रय देने वाले परिवार का ऋण चुकाना और निर्दोष लोगों की पीड़ा दूर करना उसके कर्म को धर्मपूर्ण बनाता है। कथा बताती है कि शक्ति का सर्वोच्च मूल्य तब है जब उसका उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए किया जाए।

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आदि पर्व

चैत्ररथ – अर्जुन, गन्धर्व और दिव्य ज्ञान

Chaitraratha – Arjuna, the Gandharva and Sacred Knowledge

एकचक्र के बाद पाण्डव पाञ्चाल देश की ओर बढ़ते हुए अनेक कथाएँ, वंशपरंपराएँ और ऋषियों के उपदेश सुनते हैं। यह विभाग किसी एक घटना तक सीमित नहीं है; इसमें द्रौपदी के जन्म की पृष्ठभूमि, द्रोण–द्रुपद विवाद तथा वशिष्ठ–विश्वामित्र से जुड़ी कई उपकथाएँ सम्मिलित हैं।

द्रुपद ने द्रोण के हाथों हुए अपमान का प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। द्रोण का वध करने योग्य पुत्र के लिए यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न का जन्म हुआ। उसी यज्ञाग्नि से अद्भुत सौन्दर्य वाली कृष्णा, अर्थात द्रौपदी, प्रकट हुईं और संकेत मिला कि उनका भविष्य कुरु वंश में महान परिवर्तन लाएगा।

पाण्डव पाञ्चाल जाते समय रात में गंगा तट पर चित्ररथ नामक गंधर्व से मिले। उसने अपने समय में मनुष्यों के वहाँ आने पर आपत्ति की और संघर्ष हुआ। अर्जुन ने युद्धकौशल से उसे पराजित किया, किंतु मारने के बजाय छोड़ दिया; इस प्रकार शत्रुता मित्रता में बदल गई।

कृतज्ञ होकर चित्ररथ ने अर्जुन को गंधर्व विद्याएँ और चाक्षुषी विद्या जैसे ज्ञान दिए। उसने यह भी बताया कि पाण्डवों को एक पुरोहित की आवश्यकता है और धौम्य ऋषि की शरण लेने की सलाह दी। इस प्रकार उनकी यात्रा को आध्यात्मिक और सामाजिक आधार मिला।

तपती–संवरण की कथा, वशिष्ठ की धैर्यपूर्ण भूमिका और विश्वामित्र के संघर्ष जैसी उपकथाएँ धर्म, क्षमा, तप और राजधर्म की व्यापक दृष्टि देती हैं। महाभारत मुख्य कथा के बीच ऐसे प्रसंग रखकर पात्रों और पाठकों को प्राचीन उदाहरणों से सीखने का अवसर देता है।

चैत्ररथ विभाग समाप्त होते-होते पाण्डव द्रौपदी के स्वयंवर में जाने के लिए तैयार होते हैं। अब तक वे छिपकर जीवन बिताते आए थे; अब फिर राजकीय संसार के केंद्र में प्रवेश करने वाले हैं। अर्जुन की प्रतिभा को संसार पुनः पहचानने वाला है।

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आदि पर्व

स्वयंवर – अर्जुन ने द्रौपदी को जीता

Swayamvara – Arjuna Wins Draupadi

राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर घोषित किया। अनेक देशों से राजा, राजकुमार और महान योद्धा पाञ्चाल की राजधानी पहुँचे। पाण्डव अभी भी अपनी पहचान छिपाए हुए थे और ब्राह्मण वेश में सभा में आए। कृष्ण और बलराम भी वहाँ उपस्थित थे और उन्होंने पाण्डवों को पहचाना।

स्वयंवर में अत्यंत कठिन धनुर्विद्या परीक्षा रखी गई। भारी धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ानी थी और नीचे दिखाई देने वाले प्रतिबिंब को देखकर ऊपर घूमते लक्ष्य को बाण से भेदना था। अनेक प्रसिद्ध वीरों ने प्रयास किया, पर कोई धनुष संभाल न सका या लक्ष्य नहीं भेद पाया।

कर्ण आगे आए तो कुछ परंपराओं में द्रौपदी द्वारा उनकी मानी गई जन्मस्थिति के कारण उन्हें अस्वीकार करने का वर्णन मिलता है; यह प्रसंग पाठभेदों के कारण लंबे समय से चर्चा का विषय है। अंततः ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन ने गुरुजनों को स्मरण कर धनुष उठाया और लक्ष्य सफलतापूर्वक भेद दिया।

द्रौपदी ने अर्जुन को वरमाला पहनाई। ब्राह्मण दिखाई देने वाले व्यक्ति द्वारा क्षत्रिय वीरों को पीछे छोड़ देने से सभा में हलचल मच गई और कुछ राजा युद्ध के लिए तैयार हुए। अर्जुन और भीम ने उनका सामना किया और द्रौपदी को सुरक्षित ले गए। कृष्ण समझ गए कि ये ब्राह्मण वास्तव में जीवित पाण्डव हैं।

निवास पर लौटकर पाण्डवों ने कुन्ती से कहा कि वे ‘भिक्षा’ लाए हैं। बिना देखे कुन्ती ने कह दिया कि सब मिलकर बाँट लें। उनका अनजाने में कहा वचन असाधारण धर्मसंकट बन गया—द्रौपदी पाँचों भाइयों की पत्नी कैसे हो सकती है? इसका समाधान अगले वैवाहिक विभाग में विस्तार से आता है।

स्वयंवर पाण्डवों के जीवन का महान मोड़ है। लाक्षागृह में मृत समझे गए पाण्डव अब द्रुपद जैसे शक्तिशाली राजा से संबंध स्थापित कर लेते हैं। उनके जीवित होने की बात संसार को ज्ञात होती है और कुरु राजनीति का शक्ति-संतुलन बदल जाता है।

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आदि पर्व

वैवाहिक – पाँचों पाण्डवों की पत्नी बनी द्रौपदी

Vaivahika – Draupadi Becomes Wife of the Five Pandavas

द्रौपदी को लेकर लौटने के बाद कुन्ती के अनजाने में कहे ‘सब बाँट लो’ शब्द ने परिवार को गंभीर धर्मसंकट में डाल दिया। माता का वचन असत्य न हो, यह महत्वपूर्ण था; पर एक स्त्री का पाँच भाइयों से विवाह सामान्य परंपरा नहीं थी। युधिष्ठिर ने जल्दबाजी न करके बड़ों का मार्गदर्शन लेने का निर्णय किया।

द्रुपद ने आरम्भ में इस विवाह पर गहरा संदेह व्यक्त किया। उन्हें अपनी पुत्री का भविष्य, सामाजिक धर्म और राजवंश की प्रतिष्ठा सभी पर विचार करना था। इसी समय व्यास आए और पूर्वजन्म, दैवी नियति तथा विशेष धर्म-परिस्थितियों से जुड़ी व्याख्याएँ दीं। उन्हें सुनने के बाद द्रुपद विवाह के लिए सहमत हुए।

द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डवों से नियमानुसार सम्पन्न हुआ। भाइयों में ईर्ष्या या विवाद न हो, इसलिए वैवाहिक जीवन के स्पष्ट नियम बनाए गए। एक नियम यह था कि जब द्रौपदी किसी एक भाई के साथ हों, तब दूसरा बिना अनुमति उस कक्ष में प्रवेश न करे; यही नियम आगे अर्जुन के वनवास का कारण बनता है।

इस विवाह से पाण्डवों को पाञ्चाल राज्य के साथ मजबूत राजनीतिक और पारिवारिक संबंध मिला। द्रुपद उनके सहयोगी बने और धृष्टद्युम्न उनके संबंधी। कुरु दरबार के लिए यह बड़ा राजनीतिक परिवर्तन था, क्योंकि पाण्डव अब अकेले शरणार्थी नहीं रहे थे।

यहीं से द्रौपदी महाभारत के केंद्र में प्रवेश करती हैं। वे केवल पाँच वीरों की पत्नी नहीं, बल्कि स्वाभिमान, साहस, अन्याय पर प्रश्न उठाने की शक्ति और परिवार को जोड़कर रखने की क्षमता वाली प्रमुख पात्र के रूप में उभरती हैं। सभा पर्व का द्यूत प्रसंग आगे उनके जीवन और पूरे कुरु वंश को बदल देगा।

वैवाहिक विभाग यह दिखाता है कि धर्म का निर्णय हमेशा एक साधारण नियम से नहीं किया जा सकता। परिस्थिति, वचन, नियति, बड़ों की साक्षी और संबंधित लोगों की सहमति—इन सभी पर विचार करके ही कठिन निर्णय लेना पड़ता है।

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आदि पर्व

विदुरागमन – विदुर पाण्डवों को वापस लाते हैं

Viduragamana – Vidura Brings the Pandavas Back

हस्तिनापुर पहुँची खबर ने सब कुछ बदल दिया—पाण्डव जीवित थे और द्रौपदी से विवाह करके पाञ्चाल के साथ मजबूत संबंध बना चुके थे। जनता प्रसन्न हुई, पर दुर्योधन और शकुनि का समूह चिंतित हो गया। पाण्डवों को स्थायी रूप से समाप्त मानने की उनकी योजना विफल हो चुकी थी।

धृतराष्ट्र की सभा में अलग-अलग मत आए। भीष्म, द्रोण और विदुर ने स्पष्ट कहा कि धर्मसम्मत समाधान आवश्यक है। पाण्डवों का अधिकार रोकना राजवंश के लिए और बड़ा संकट पैदा कर सकता है, और खुली शत्रुता पाञ्चाल जैसे शक्तिशाली सहयोगियों को भी कुरुओं के विरुद्ध ला सकती है।

विदुर को पाञ्चाल भेजकर पाण्डवों को सम्मानपूर्वक हस्तिनापुर बुलाने का निर्णय हुआ। विदुर ने द्रुपद और पाण्डवों से मिलकर राजसभा का संदेश दिया। पिछले षड्यंत्रों के कारण सावधानी स्वाभाविक थी, फिर भी पाण्डवों ने बड़ों का सम्मान करते हुए लौटना स्वीकार किया।

कुन्ती और द्रौपदी के साथ पाण्डव जब हस्तिनापुर पहुँचे तो जनता ने उनका भव्य स्वागत किया। लंबे गुप्त जीवन के बाद वे फिर राजवंश के सदस्य के रूप में खुले रूप से सामने आए। लाक्षागृह के बाद बनी ‘मृत उत्तराधिकारियों’ की धारणा पूरी तरह समाप्त हुई।

विदुर इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ रहे। उन्हें पाण्डवों से प्रेम था, पर कुरु राज्य के प्रति भी जिम्मेदारी थी। इसलिए वे केवल व्यक्तिगत संबंध से नहीं, बल्कि धर्मपूर्ण संतुलन के लिए कार्य करते रहे। उनकी सलाह ने कुछ समय के लिए परिवार को खुले युद्ध से दूर रखा।

फिर भी मूल समस्या—दुर्योधन की ईर्ष्या—समाप्त नहीं हुई थी। इसलिए यह व्यवस्था स्थायी शांति नहीं बन सकी। कथा अब राज्य को बाँटकर दोनों पक्षों को शासन का क्षेत्र देने की ओर बढ़ती है, जिससे अगले राजलाभ विभाग में इन्द्रप्रस्थ का उदय होता है।

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आदि पर्व

राज्यलाभ – पाण्डवों को मिला राज्य

Rajyalabha – The Pandavas Receive Their Kingdom

कुरु परिवार में कुछ समय की शांति के लिए राज्य का विभाजन स्वीकार किया गया। पाण्डवों को खाण्डवप्रस्थ का क्षेत्र मिला, जो विकसित राजधानी नहीं बल्कि जंगलों और उपेक्षित भूमि वाला कठिन प्रदेश था। दुर्योधन के पक्ष को यह बहुत मूल्यवान हिस्सा नहीं लगा होगा, पर पाण्डवों ने उसे अवसर के रूप में स्वीकार किया।

कृष्ण और मित्रों के सहयोग से पाण्डवों ने उस प्रदेश को विकसित किया। शिल्पी, व्यापारी और नागरिक वहाँ आए; चौड़ी सड़कें, महल, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हुई। नई राजधानी का नाम इन्द्रप्रस्थ पड़ा और युधिष्ठिर ने धर्मपूर्ण शासन से प्रजा का विश्वास जीता।

भीम ने सुरक्षा में, अर्जुन ने सैन्य शक्ति में, नकुल और सहदेव ने प्रशासन तथा संपदा-संवर्धन में अपनी भूमिका निभाई। द्रौपदी ने महारानी के रूप में परिवार और राजसभा को संभाला। कठिन भूमि को समृद्ध राज्य में बदलना पाण्डवों की निर्माण और शासन क्षमता का प्रमाण बना।

इन्द्रप्रस्थ की समृद्धि ने पाण्डवों का सम्मान बढ़ाया, किंतु दुर्योधन की ईर्ष्या को भी नया कारण मिला। जो व्यक्ति पाण्डवों के नष्ट होने की आशा कर रहा था, उसे अब उन्हें अधिक शक्तिशाली राज्य बनाते देखना पड़ा। बाद में मयसभा देखने पर यही ईर्ष्या चरम पर पहुँचेगी।

इसी समय द्रौपदी के साथ वैवाहिक जीवन से जुड़ी पारिवारिक व्यवस्थाएँ भी दृढ़ की गईं। परिवार की एकता बचाने के लिए बने इन नियमों में से एक शीघ्र ही अर्जुन के जीवन में निर्णायक घटना का कारण बनेगा।

राज्यलाभ एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है: हाथ में आया हिस्सा छोटा या कठिन हो, तो भी उसे योग्य परिश्रम से महान अवसर बनाया जा सकता है। पाण्डव अन्याय की शिकायत करते बैठने के बजाय मिले हुए भूभाग को राजधानी में बदलते हैं; साथ ही सफलता नई जिम्मेदारियाँ और नई प्रतिद्वंद्विता भी लाती है।

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आदि पर्व

अर्जुन-वनवास – अर्जुन का प्रवास और तीर्थयात्रा

Arjuna-vanavasa – Arjuna's Exile and Pilgrimage

द्रौपदी के विवाह के बाद पाण्डवों ने पारिवारिक एकता के लिए नियम बनाया कि जब द्रौपदी किसी एक भाई के साथ हों, तब दूसरा उस निजी स्थान में प्रवेश करे तो उसे निश्चित अवधि का वनवास करना होगा। इसका उद्देश्य पारस्परिक सम्मान बनाए रखना और ईर्ष्या से बचना था।

एक दिन एक ब्राह्मण की गायें चोर ले गए और उसने सहायता माँगी। अर्जुन के शस्त्र उस कक्ष में थे जहाँ युधिष्ठिर और द्रौपदी साथ थे। अर्जुन के सामने वास्तविक धर्मसंकट था—परिवार का नियम निभाए या क्षत्रिय होने के नाते पीड़ित व्यक्ति की रक्षा करे।

अर्जुन ने कर्तव्य को प्राथमिकता दी, कक्ष में जाकर शस्त्र लिए, चोरों को पराजित किया और गायें वापस दिलाईं। युधिष्ठिर ने कहा कि ऐसी विशेष परिस्थिति में वनवास आवश्यक नहीं, पर अर्जुन ने माना कि स्वीकृत नियम को तोड़ने का परिणाम स्वयं स्वीकार करना चाहिए। इससे उसकी वचननिष्ठा प्रकट होती है।

वनवास यात्रा में अर्जुन ने अनेक तीर्थों का दर्शन किया। गंगा में नागकन्या उलूपी से उसका मिलन हुआ और इरावान का जन्म हुआ। आगे मणिपुर में उसने चित्रांगदा से विवाह किया और बभ्रुवाहन का पिता बना। ये संबंध बाद की महाभारत कथा में फिर महत्वपूर्ण बनते हैं।

यह यात्रा केवल विवाहों की श्रृंखला नहीं थी। अर्जुन ने अनेक प्रदेश, संस्कृतियाँ और ऋषियों को देखा; उसका अनुभव विस्तृत हुआ और भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों से संबंध बने। आगे चलकर इन संबंधों का राजनीतिक और सैनिक महत्व भी दिखाई देता है।

अंततः अर्जुन की यात्रा उसे यादवों के क्षेत्र तक ले गई। वहाँ कृष्ण के साथ उसकी मित्रता और गहरी हुई और सुभद्रा से प्रेम का आरम्भ हुआ। यही संबंध पाण्डव और यादव परिवारों के बंधन को स्थायी रूप से मजबूत करने वाला था।

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आदि पर्व

सुभद्रा-हरण – अर्जुन और सुभद्रा

Subhadra-harana – Arjuna and Subhadra

तीर्थयात्रा के दौरान अर्जुन द्वारका के क्षेत्र पहुँचा और कृष्ण की बहन सुभद्रा को देखा। उसे उनसे प्रेम हो गया। कृष्ण ने अर्जुन के मन को समझा और परिवार तथा राजनीति की स्थिति बताई; परंपरा के अनुसार बलराम सुभद्रा के लिए किसी अन्य विवाह-संबंध पर विचार कर रहे थे।

कृष्ण ने समझाया कि स्वयंवर का परिणाम अनिश्चित हो सकता है और यदि परस्पर प्रेम हो तो क्षत्रिय परंपरा में हरण-विवाह भी एक मार्ग माना जाता है। अर्जुन सुभद्रा को रथ पर लेकर चला गया। यादव वीरों ने पहले इसे अपमान समझा और युद्ध की तैयारी की।

कृष्ण ने सभा को शांत किया। उन्होंने कहा कि अर्जुन कोई साधारण अपहरणकर्ता नहीं, बल्कि महान वीर और पाण्डव वंश का योग्य राजकुमार है। सुभद्रा की सहमति को भी महत्व दिया गया और युद्ध की स्थिति विवाह में बदल गई।

अर्जुन–सुभद्रा विवाह ने पाण्डवों और यादवों के बीच अत्यंत महत्वपूर्ण पारिवारिक संबंध स्थापित किया। कृष्ण पहले ही पाण्डवों के घनिष्ठ मित्र थे; अब वह मैत्री रक्त-संबंध में बदल गई। आगे की राजनीति में यह बंधन अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

इस दम्पति से अभिमन्यु का जन्म हुआ। वह कम आयु में ही असाधारण योद्धा बना और कुरुक्षेत्र में चक्रव्यूह के भीतर दिखाए अपने साहस से अमर हो गया। इसलिए सुभद्रा-हरण केवल प्रेमकथा नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के महावीर की कथा का आरम्भ भी है।

अर्जुन जब सुभद्रा को लेकर इन्द्रप्रस्थ लौटा, तो परिवार में एक संवेदनशील नया चरण शुरू हुआ। द्रौपदी की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस नए संबंध को परिवार में कैसे स्वीकार किया गया—यह अगला हरणाहरण विभाग बताता है।

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आदि पर्व

हरणाहरण – वापसी, मेल-मिलाप और पारिवारिक संबंध

Haranaharana – Return, Reconciliation and Family Bonds

सुभद्रा के साथ इन्द्रप्रस्थ लौटते समय अर्जुन समझता था कि द्रौपदी के मन में नई शादी को लेकर स्वाभाविक दुख या असंतोष हो सकता है। परिवार में शांति बनाए रखने के लिए नए संबंध को गर्व से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता से प्रस्तुत करना आवश्यक था।

प्रसिद्ध परंपरा के अनुसार सुभद्रा साधारण गोपिका के वेश में द्रौपदी के पास गई और विनम्रता से प्रणाम किया। उसकी नम्रता से द्रौपदी का हृदय पिघला। द्रौपदी ने उसे आशीर्वाद दिया कि उसके पति के शत्रु न रहें और स्नेहपूर्वक उसे स्वीकार किया।

यह छोटा भाग महाभारत में पारिवारिक संबंधों की सूक्ष्मता दिखाता है। विशाल युद्धों, राज्यों और दिव्यास्त्रों के बीच भी ईर्ष्या, पीड़ा, प्रेम, सम्मान और आत्मसम्मान जैसी मानवीय भावनाएँ कथा को प्रभावित करती हैं।

अर्जुन ने अपने निर्णय की जिम्मेदारी स्वीकार की, सुभद्रा विनम्रता से आगे बढ़ी और द्रौपदी ने अंततः उदारता से उसे अपनाया। तीनों के आचरण ने कठिन परिस्थिति को बड़े पारिवारिक विवाद में बदलने से रोक दिया। परस्पर सम्मान जटिल संबंधों को भी संतुलित कर सकता है।

अर्जुन और सुभद्रा से अभिमन्यु जन्मा। द्रौपदी को पाँचों पाण्डवों से प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन जैसे उपपाण्डव पुत्र प्राप्त हुए। नई पीढ़ी बढ़ने लगी और इन्द्रप्रस्थ समृद्ध राज्य के रूप में आगे बढ़ा।

अब कथा आदि पर्व के अंतिम महान प्रसंग—खाण्डव वन दहन—के लिए तैयार होती है। वहाँ अर्जुन और कृष्ण की मित्रता असाधारण युद्धशक्ति के रूप में प्रकट होगी और मय दानव के बचने से आगे के सभा पर्व की सीधी भूमिका बनेगी।

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आदि पर्व

खाण्डव-दाह – खाण्डव वन का दहन

Khandava-daha – The Burning of the Khandava Forest

खाण्डव वन दहन आदि पर्व का अंतिम विशाल प्रसंग है। एक दिन कृष्ण और अर्जुन यमुना तट पर थे, तभी ब्राह्मण वेश में अग्निदेव उनके पास आए। उन्होंने बताया कि वे खाण्डव वन को भस्म करना चाहते हैं, पर हर बार इन्द्र वर्षा करके अग्नि को बुझा देते हैं।

एक प्रसिद्ध परंपरा के अनुसार राजा श्वेतकि के दीर्घ यज्ञों में अत्यधिक घी ग्रहण करने से अग्नि दुर्बल हो गए थे। ब्रह्मा की सलाह पर उन्हें विश्वास था कि खाण्डव वन की औषधियों और जीवसंपदा को भक्षण करने से उनका तेज वापस आएगा। किंतु उस वन में नागराज तक्षक रहता था, जो इन्द्र का मित्र था; इसलिए इन्द्र वन की रक्षा करते थे।

अर्जुन सहायता के लिए तैयार था, लेकिन उसने कहा कि देवताओं का सामना करने योग्य शस्त्र आवश्यक होंगे। वरुण के माध्यम से उसे गांडीव धनुष, अक्षय तूणीर और दिव्य रथ प्राप्त हुए। परंपराएँ कृष्ण के सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा को भी इस प्रसंग से जोड़ती हैं, जिससे दोनों मित्र महान संघर्ष के लिए सुसज्जित हुए।

अग्नि ने वन को घेर लिया तो इन्द्र ने मेघ भेजकर भारी वर्षा कराई। अर्जुन ने आकाश में बाणों की दीवार बनाकर पानी को आग तक पहुँचने से रोका और कृष्ण ने भागने की कोशिश करने वाले शक्तिशाली जीवों का सामना किया। देवता, गंधर्व, नाग और अन्य शक्तियाँ संघर्ष में शामिल हुईं और कृष्ण–अर्जुन का समन्वय अद्भुत युद्धशक्ति के रूप में दिखाई दिया।

इस दहन में अनेक जीव नष्ट हुए, जबकि कुछ बच निकले या बचा लिए गए। मय दानव ने अर्जुन की शरण ली और उसे जीवन मिला; अश्वसेन तथा कुछ अन्य भी बच गए। महाभारत इस प्रसंग को महान पराक्रम के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन इतना व्यापक विनाश आधुनिक पाठक के सामने नैतिक प्रश्न भी रखता है। महाकाव्य शक्ति के साथ उसके परिणामों को भी सामने रखता है।

जीवन बचाने के लिए कृतज्ञ मय ने अर्जुन से पूछा कि वह क्या सेवा करे। अर्जुन ने निजी लाभ नहीं माँगा और कहा कि ऐसा कार्य करे जिससे कृष्ण प्रसन्न हों। अंततः युधिष्ठिर के लिए अद्वितीय सभा-भवन बनाने का संकल्प हुआ। यही मयसभा आगे सभा पर्व की प्रमुख घटनाओं का मंच बनती है।

खाण्डव दहन के साथ आदि पर्व समाप्ति की ओर पहुँचता है। नैमिषारण्य के ऋषियों की कथा सुनने की इच्छा से आरम्भ हुआ यह पर्व कुरु वंश के जन्म, पाण्डवों के बाल्यकाल, षड्यंत्रों, द्रौपदी-विवाह, इन्द्रप्रस्थ की स्थापना और अर्जुन की यात्राओं से गुजरता हुआ पाण्डवों की उभरती शक्ति पर समाप्त होता है। यही सफलता अगले सभा पर्व में नई ईर्ष्या और नए संकट का कारण बनेगी।