आदि पर्व
अनुक्रमणिका – महाभारत कथा का आरम्भ
Anukramanika – The Epic Begins
नैमिषारण्य के पवित्र वन में शौनक महर्षि बारह वर्षों का यज्ञ कर रहे थे और अनेक ऋषि वहाँ एकत्र होकर धर्मचर्चा में लगे रहते थे। उसी समय पुराणों, इतिहासों और वंशकथाओं के महान ज्ञाता लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सौति वहाँ पहुँचे। ऋषियों ने अतिथि के रूप में उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और पूछा कि वे कहाँ से आए हैं तथा कौन-कौन सी महान कथाएँ सुनकर आए हैं।
सौति ने बताया कि वे राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में उपस्थित थे, जहाँ वैशम्पायन महर्षि ने भगवान व्यास की आज्ञा से महाभारत की कथा सुनाई थी। इसके बाद वे समन्तपञ्चक जैसे अनेक पवित्र स्थलों का दर्शन करते हुए नैमिषारण्य पहुँचे। यह सुनकर ऋषियों ने उनसे वही महाभारत उन्हें भी सुनाने का अनुरोध किया।
कथा आरम्भ करने से पहले सौति नारायण, नर और देवी सरस्वती को प्रणाम करके ‘जय’ नामक महान आख्यान का स्मरण करने की परंपरा बताते हैं। वे समझाते हैं कि व्यास ने इस महाकाव्य को केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं बनाया, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को समेटने वाले ज्ञानसागर के रूप में रचा।
प्रसिद्ध परंपरा के अनुसार जब व्यास ने महाभारत को लिखित रूप देने का संकल्प किया, तब उन्होंने ब्रह्मा का ध्यान किया। ब्रह्मा ने उन्हें गणपति को लेखक बनाने की सलाह दी। गणपति ने शर्त रखी कि व्यास बिना रुके बोलेंगे; व्यास ने प्रत्युत्तर में कहा कि गणपति प्रत्येक श्लोक का अर्थ पूरी तरह समझकर ही लिखेंगे। कहा जाता है कि इसी कारण व्यास गहन अर्थ वाले श्लोक रचते हुए कथा को आगे बढ़ा सके।
आरम्भ से ही महाभारत का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। यह दिखाने वाला है कि एक निर्णय दूसरे निर्णय का कारण कैसे बनता है, एक प्रतिज्ञा पीढ़ियों का भविष्य कैसे बदल सकती है और व्यक्तिगत क्रोध राजाओं तथा राज्यों के विनाश तक कैसे पहुँच सकता है। इसी विशालता को उस परंपरागत कथन में व्यक्त किया जाता है कि जो यहाँ है वह कहीं और भी मिल सकता है, और जो यहाँ नहीं है वह अन्यत्र मिलना कठिन है।
इस प्रकार नैमिषारण्य के ऋषियों के सामने सौति महाभारत की महान कथा का द्वार खोलते हैं। श्रोता केवल वीरगाथाएँ सुनने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए तैयार होते हैं कि धर्मसंकट में मनुष्य कैसे सोचे, शक्ति मिलने पर कैसे आचरण करे और परिवार के संबंध कब शक्ति तथा कब दुर्बलता बनते हैं। यही अनुक्रमणिका का प्रमुख उद्देश्य है।