वन पर्व
वन प्रवेश – पाण्डवों का वनवास आरम्भ
Entering the Forest – The Exile Begins
दूसरे द्यूत में पराजित होने के बाद युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर छोड़कर वन की ओर चले। राजमहलों और संपत्ति का स्थान अब वन-पथों, बारह वर्ष के वनवास और उसके बाद एक वर्ष के अज्ञातवास ने ले लिया।
अनेक नागरिक उनके साथ चलना चाहते थे, लेकिन युधिष्ठिर ने उन्हें अपने परिवारों और उत्तरदायित्वों को छोड़कर उनके कारण कष्ट न उठाने की सलाह दी और वापस लौटने को कहा।
कुन्ती आयु और वनजीवन की कठिनाइयों के कारण विदुर की देखरेख में हस्तिनापुर में ही रहीं।
ब्राह्मण और तपस्वी भी पाण्डवों के साथ वन में आए। राजकोष न होने पर भी युधिष्ठिर उन सबके भोजन और आश्रय को अपनी जिम्मेदारी मानते रहे।
वनवास के आरम्भ से ही धर्म की परीक्षा नए रूप में हुई—राज्य छिन गया था, पर उत्तरदायित्व समाप्त नहीं हुए थे।